जीवन
अब तो आदि हो चुके हैं, हम भी बंदर बाँट के,
कौन जाने बिल्लियां, किस मोड़ पे लड़ने लगें ।।
रवि शंकर सिंह
' मंथन '
दो घड़ी को ही तो आती है नींद बहलाने उस पर तेरा ख्याल जगा देता है हो गया है तुझसा ही ख़्याल तेरा भी न बैठे है मेरे पास दग़ा देता है ...