मुक्तक
फसे मजधर में जो हम , किनारों ने हमें मारा ।।
कभी मरते बहारों से नजारों ने हमें मारा ।।
गए थे उनसे मिलने को हुई हालत हमारी ये,
कि उनके चार भाई थे ओ’ चारों ने हमें मारा ।।
रवि शंकर सिंह
‘मंथन’
शाख पर जब धूल गई, तो पत्तियाँ अच्छी लगी।। रात में जलती हुई सब, बत्तीयाँ अच्छी लगी।। जब अचानक रुक गई, ये नाम लेने से तेरा तबसे मुझको ...