Monday, September 28, 2020

ग़ज़ल

 ग़ज़ल


जब से हमारे हाथ में शराब नहीं है ।।
आंखों में कोई भी तो खाब नहीं है ।।


उसकी रोशनी से है गुलजार कोई और,
की मेरी छत पे मेरा ही मेहताब नहीं है ।।


वह जाते-जाते दे गया है मर्ज ला इलाज,
दुनिया में मर्ज इश्क सा कोई खराब नहीं है ।।


दिल में तमन्ना खलिश आंखों में लिए हैं,
मुझसा तो कोई और इज्तराब नहीं है ।।


खुद बदल के राह मुझको बेवफा कहा,
सनम तेरे सितम का भी जवाब नहीं है ।।



रवि शंकर सिंह
    ' मंथन '

इज्तराब  ( बेचैनी )

Saturday, September 26, 2020

डूबा सूरज

 डूबा सूरज


सूरज निकला था आज

पूरब से,

रोज ही निकलता है

पर आज कुछ तपिश कम थी

कम था ताप

चमक

उजाला

पर सूरज तो निकला था

यही गनीमत है

वरना एक रोज

डूब गया था 

सूरज

भीतर ही भीतर

मेरे भीतर


रवि शंकर सिंह

' मंथन '

Thursday, September 10, 2020

मुक्तक

 

मुक्तक

आबाद अगर न हो पाओ, तो मेरी याद भुला देना ।।

याद बहुत तो आऊँगा, लेकिन हर बात भुला देना ।।


जो आगे बढ़ने से रोकें, और बने बेड़ियाँ पैरों की,

है तुम्हें इजाजत मेरी जाँ , ऐसे जज़्बात भुला देना ।।


रवि शंकर सिंह

' मंथन '

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