ग़ज़ल
जब से हमारे हाथ में शराब नहीं है ।।
आंखों में कोई भी तो खाब नहीं है ।।
उसकी रोशनी से है गुलजार कोई और,
की मेरी छत पे मेरा ही मेहताब नहीं है ।।
वह जाते-जाते दे गया है मर्ज ला इलाज,
दुनिया में मर्ज इश्क सा कोई खराब नहीं है ।।
दिल में तमन्ना खलिश आंखों में लिए हैं,
मुझसा तो कोई और इज्तराब नहीं है ।।
खुद बदल के राह मुझको बेवफा कहा,
सनम तेरे सितम का भी जवाब नहीं है ।।
रवि शंकर सिंह
' मंथन '
इज्तराब ( बेचैनी )