Saturday, June 21, 2025

हिचकियाँ

शाख पर जब धूल गई, तो पत्तियाँ अच्छी लगी।।
रात में जलती हुई सब, बत्तीयाँ अच्छी लगी।।

जब  अचानक  रुक  गई,  ये  नाम  लेने  से तेरा 
तबसे मुझको आ रही ये हिचकियाँ अच्छी लगी।।

रवि शंकर सिंह 

Saturday, September 17, 2022

मैंने अनवरत लड़े युद्ध

 मैंने अनवरत लड़े युद्ध

                                                          रवि शंकर सिंह ‘मंथन’

अम्बर में कुंतल जाल एक
मैंने देखा पाताल एक

फूलों की तुलसी माल एक
कैदी पंछी का हाल एक ।।



दोनों आँखों को मूँद मूँद
पीते थे पानी बूँद बूँद
राजा और रानी चले गए
सुनों एक कहानी बूँद बूँद

पानी के झरने का बहना
वो आसमान का एक गहना
मैं तुम्हें सुनाता शब्द शब्द
उसका था जो मुझसे कहना


मैंने अनवरत लड़े युद्ध

उसपर भी दुनियां रही क्रुद्ध

मैंने भी उनसे बात कहीं

न हो पाउँगा महा बुद्ध



बादल आसमान में काले हैं

हम भी थोड़े मतवाले हैं





बन पड़े जो तुमसे कर लेना

हम तलवार उठाने वाले हैं



थी मौत सामने खड़ी और

छाया होती थी बड़ी और

वह वक्त और था घड़ी और

अपनी तलवारें लड़ी और



फिर टूटी साँसे उखड़ गई

सब हवा हवा में बिखर गई

अब कोई जाने कैसे जाने

      चिड़िया आसमान में किधर गई ।।।


रवि शंकर सिंह 

मंथन

कविता को सुनने के लिए लिंक पर क्लिक करें :–


https://youtu.be/Vpjnhxs2AnI

Sunday, August 8, 2021

सब समझता हूं

मुक्तक


सब समझता हूं तुम्हारी ये इशारेबाजियां ।।

जानलेवा हो रही हैं अब कमर की चाबियां ।।

जन्मभर के हैं जो सुधरे लाल मां के हैं सभी,

माँ के प्यारों को सदा से ही बिगाड़े भाभियां ।।


रवि शंकर सिंह
मंथन


Wednesday, June 23, 2021

फसे मजधर में जो हम

 मुक्तक


फसे मजधर में जो हम , किनारों ने हमें मारा ।।

कभी मरते बहारों से नजारों ने हमें मारा ।।

गए थे उनसे मिलने को हुई हालत हमारी ये,

कि उनके चार भाई थे ओ’ चारों ने हमें मारा ।।


रवि शंकर सिंह
     ‘मंथन’

Thursday, April 22, 2021

मैं उससे रूठ जाता हूं

 मुक्तक


मैं उससे रूठ जाता हूं वो मुझसे रूठ जाती है ।।

मैं उससे दूर जाता हूं वो बिलकुल टूट जाती है ।।

की पहले आप पहले आप में अक्सर ये होता है,

खड़े रहते हैं इसटेसन पे गाड़ी छूट जाती है ।।


रवि शंकर सिंह 

     ‘मंथन’

Wednesday, April 21, 2021

तू भी है और मैं भी हूं

 मुक्तक



नफ़रत का जिंदा एक पुलिंदा तू भी है और मैं भी हूं ।।


पिंजरे का कैदी एक परिंदा तू भी है और मैं भी हूं ।।


सूख गया हर फूल खिला जो एक गुलिस्तान ऐसा है,


जाने कैसे अब तक जिंदा तू भी है और मैं भी हूं ।।


रवि शंकर सिंह 

    ‘मंथन’



Tuesday, April 20, 2021

चिट्ठियां जो लिखी

 मुक्तक


चिठियाँ जो लिखी सब पड़ी रह गई ।।


बात दिल की थी दिल में गड़ी रह गई ।।


की लौट आएंगे वो बस इसी आस में 

इक ही स्टेशन पे गाड़ी खड़ी रह गई ।।



रवि शंकर सिंह
( मंथन )

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