शाख पर जब धूल गई, तो पत्तियाँ अच्छी लगी।।
रात में जलती हुई सब, बत्तीयाँ अच्छी लगी।।
जब अचानक रुक गई, ये नाम लेने से तेरा
तबसे मुझको आ रही ये हिचकियाँ अच्छी लगी।।
रवि शंकर सिंह
रवि शंकर सिंह
मंथन
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