Wednesday, April 21, 2021

तू भी है और मैं भी हूं

 मुक्तक



नफ़रत का जिंदा एक पुलिंदा तू भी है और मैं भी हूं ।।


पिंजरे का कैदी एक परिंदा तू भी है और मैं भी हूं ।।


सूख गया हर फूल खिला जो एक गुलिस्तान ऐसा है,


जाने कैसे अब तक जिंदा तू भी है और मैं भी हूं ।।


रवि शंकर सिंह 

    ‘मंथन’



No comments:

Post a Comment

नई पोस्ट

तेरा ख़्याल

दो घड़ी को ही तो आती है नींद बहलाने  उस पर तेरा ख्याल जगा देता है  हो गया है तुझसा ही ख़्याल तेरा भी  न बैठे है मेरे पास दग़ा देता है  ...

सर्वाधिक खोजी गई पोस्ट