गुनगुनाओगे जब ग़ज़ल मेरी ।।
राज़ खोलेगी सब ग़ज़ल मेरी ।।
मुख़्तसर तुम तो मुझसे कहते नहीं,
मुख़्तसर होगी अब ग़ज़ल मेरी ।।
तुझपे ता-उम्र ग़ज़ल लिखूंगा,
बन गई है तलब ग़ज़ल मेरी ।।
उम्र गुज़री वफ़ा निभाने में,
दिल टोलेगी अब ग़ज़ल मेरी ।।
इश्क तमन्ना वफ़ा तिजारत भी
हो गई है सब ग़ज़ल मेरी ।।
तेरी भी आँखों से बहेंगे आँसू,
तुझसे बोलेगी जब ग़ज़ल मेरी ।।
हैं सभी देखते मुझको बेबस,
मेरा खुदा है रब ग़ज़ल मेरी ।।
रवि शंकर सिंह
''मंथन'