ये तुमसे देखते न बनेगा मगर देखो ।।
क्या से क्या कर दिया तुमने आयकर देखो ।।
मेरे खाबों की हकीकत को झूठ समझने वालों,
कैसे छाती है यहाँ रात जाग कर देखो ।।
रास्ते स्याह हैं काटों से भरे हैं लेकिन,
न हो यकीन किसी एक पे चल कर देखो ।।
कितने बेताब दिल हैं यहां फिरे सड़कों पर,
हाँ! मेरी जान जरा घर से निकल कर देखो ।।
तोड़ने वालों ने तोड़ा तो बहुत है लेकिन,
कैसे बनता है पुर्जा पुर्जा ये शहर देखो ।।
एक नया ताज बनाऊंगा मैं तेरे खातिर,
आता न हो यकीन तो मरकर देखो ।।
सबको मिटाने का रास्ता जो तुमने खोजा है,
लगेगा बरसने कुदरत का फिर कहर देखो ।।
रवि शंकर सिंह
'मंथन'
No comments:
Post a Comment