Sunday, August 8, 2021

सब समझता हूं

मुक्तक


सब समझता हूं तुम्हारी ये इशारेबाजियां ।।

जानलेवा हो रही हैं अब कमर की चाबियां ।।

जन्मभर के हैं जो सुधरे लाल मां के हैं सभी,

माँ के प्यारों को सदा से ही बिगाड़े भाभियां ।।


रवि शंकर सिंह
मंथन


Wednesday, June 23, 2021

फसे मजधर में जो हम

 मुक्तक


फसे मजधर में जो हम , किनारों ने हमें मारा ।।

कभी मरते बहारों से नजारों ने हमें मारा ।।

गए थे उनसे मिलने को हुई हालत हमारी ये,

कि उनके चार भाई थे ओ’ चारों ने हमें मारा ।।


रवि शंकर सिंह
     ‘मंथन’

Thursday, April 22, 2021

मैं उससे रूठ जाता हूं

 मुक्तक


मैं उससे रूठ जाता हूं वो मुझसे रूठ जाती है ।।

मैं उससे दूर जाता हूं वो बिलकुल टूट जाती है ।।

की पहले आप पहले आप में अक्सर ये होता है,

खड़े रहते हैं इसटेसन पे गाड़ी छूट जाती है ।।


रवि शंकर सिंह 

     ‘मंथन’

Wednesday, April 21, 2021

तू भी है और मैं भी हूं

 मुक्तक



नफ़रत का जिंदा एक पुलिंदा तू भी है और मैं भी हूं ।।


पिंजरे का कैदी एक परिंदा तू भी है और मैं भी हूं ।।


सूख गया हर फूल खिला जो एक गुलिस्तान ऐसा है,


जाने कैसे अब तक जिंदा तू भी है और मैं भी हूं ।।


रवि शंकर सिंह 

    ‘मंथन’



Tuesday, April 20, 2021

चिट्ठियां जो लिखी

 मुक्तक


चिठियाँ जो लिखी सब पड़ी रह गई ।।


बात दिल की थी दिल में गड़ी रह गई ।।


की लौट आएंगे वो बस इसी आस में 

इक ही स्टेशन पे गाड़ी खड़ी रह गई ।।



रवि शंकर सिंह
( मंथन )

Sunday, April 18, 2021

ये ख्वाबों में कब तक


मुक्तक




ये ख्वाबों में कब तक मुलाकात होगी ।।


हकीकत में बोलो ना कब बात होगी ।।


गए कितने दिन मुझको भीगी मिली थी,


बताओ ना फिर कब वो बरसात होगी ।।



रवि शंकर सिंह
     ‘मंथन’

Friday, March 26, 2021

बिना पते की चिट्ठी

 बिना पते की चिट्ठी


मेरी किताब के पच्चीसवें पन्ने पर


लिखा था एक पता


जिसका पता मुझे नहीं था


जाने किसका था


शायद आत्मीय किसी का


कल पहुंच गया 


उसी पाते पर


जो लिखा था


मेरी किताब के पच्चीसवें पन्ने पर


दरवाजा खटखटाया तो निकली


एक छोटी सी बच्ची


अपनी माँ की उंगली पकड़े


माँं 


जिसे कभी देखा था मैंने


कॉलेज के चुनाव प्रचार में


पर अब नहीं था उसमें वो जुझारूपन


थीं झुर्रियां गालों पर


भंवर था मगर जिंदगी में


उसने नहीं देखा अब मुझे


छत की मुंडेर से


और मैं


लौट आया वापस


खुरदरी हथेली लिए


समय के शहर से


बिना पते की चिट्ठी सा



रवि शंकर सिंह
     ’मंथन’

Tuesday, March 9, 2021

गुलाब की याद


गुलाब की याद


किताबों के पन्ने पलटते हुए


सरसराहट के बीच


मिला था एक सूखा गुलाब


यादें समेटे हुए


याद आ गया अचानक


केंटीन का वो दिन


कंधों पर रखा हुआ सर


आंखों से बहते हुए आंसू


और आंसू बहाती खूबसूरत सी आंखें


आखरी दिन था कॉलेज का


कालेज के बाहर तक का सफर


बड़ा लगा था बहुत बड़ा


मगर दरवाजे के बाहर


हम दोनो दो बसें हो गए


एक रास्ते पर चलते हुए 


अलग मंजिल पहुंचने वाली 


बसें


अब


फिर हम दोनों को बन जाना था


किताब में रखा हुआ गुलाब


और गुलाब की याद 


रवि शंकर सिंह
    ' मंथन '



Friday, January 8, 2021

याद तुम्हारी आती है

गीत



याद तुम्हारी आती है



जब स्याह अँधेरी रातों में,
        नन्हा सा दीपक जलता है ।।


तब नन्हीं नन्हीं आँखों में 
        ख्वाब कोई तो पलता है ।।


जब ख्वाबों की तपिश यहाँ 
        सुख सारे ले जाती हैं ।।


तब और नहीं कुछ याद रहे 
        बस याद तुम्हारी आती है ।। 1 ।। 

जब सावन की बही बयारें 
       भीतर तक सुलगाती हैं ।


और जेठ वाली आँधी भी
       ठंडक सी पहुंचाती है ।


जब बार बार की मांग जाँच 
       झोली ख़ाली कर जाती है ।


तब और नहीं कुछ याद रहे 
       बस याद तुम्हारी आती है ।। 2 ।।

जब उम्मीदें कुछ संस्कार 
       बेडी बन कर रह जाते हैं ।


खुद ही खुद को खो बैठें 
       हम ढूंढे से ना पाते हैं ।


जब दूर तलक सन्नाटों में 
        वीरानी सी छा जाती है ।


तब और नहीं कुछ याद रहे 
       बस याद तुम्हारी आती है ।। 3 ।।



गर्म अंगीठी होती है 
       चूल्हे ठंडे रह जाते हैं ।


और रिश्ते नाते नहीं रहें 
       केवल पंगे रह जाते हैं ।


जब भीगी-भीगी सांझों वाली 
       रात सुहानी आती है ।


तब और नहीं कुछ याद रहे 
       बस याद तुम्हारी आती है ।। 4 ।।


कई तो ऐसे वर्ष यहां पर 
       सूखे खाली जाते हैं ।


हैं जाने कितनी राहें जिनपर 
       हम जाते ना आते हैं ।


जब कांटों की चुभन हमें 
       दोहरा-दोहरा सुलगाती है ।


तब और नहीं कुछ याद रहे 
       बस याद तुम्हारी आती है ।। 5 ।।


कुछ लोग तो ऐसे होते हैं 
       जाते हैं लौट ना आने को ।


छोड़ के जाते हैं यादें 
       बस जीवन भर तडपाने को ।


जब हृदयों की तड़प निकल कर 
       आंखों में आ जाती है ।


तब और नहीं कुछ याद रहे 
       बस याद तुम्हारी आती है ।। 6 ।।


कई बार कुछ लोग यहां 
        मिल जाते हैं वीराने में ।


कई बार सदियां लगती हैं 
        खुद को खो कर पाने में ।


जब खुद की यादें ही खुद को 
        पीड़ा ग्रह लेे जाती हैं ।


तब और नहीं कुछ याद रहे 
        बस याद तुम्हारी आती है ।। 7 ।।


रवि शंकर सिंह
    ' मंथन '







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