गीत
याद तुम्हारी आती है
जब स्याह अँधेरी रातों में,
नन्हा सा दीपक जलता है ।।
तब नन्हीं नन्हीं आँखों में
ख्वाब कोई तो पलता है ।।
जब ख्वाबों की तपिश यहाँ
सुख सारे ले जाती हैं ।।
तब और नहीं कुछ याद रहे
बस याद तुम्हारी आती है ।। 1 ।।
जब सावन की बही बयारें
भीतर तक सुलगाती हैं ।
और जेठ वाली आँधी भी
ठंडक सी पहुंचाती है ।
जब बार बार की मांग जाँच
झोली ख़ाली कर जाती है ।
तब और नहीं कुछ याद रहे
बस याद तुम्हारी आती है ।। 2 ।।
जब उम्मीदें कुछ संस्कार
बेडी बन कर रह जाते हैं ।
खुद ही खुद को खो बैठें
हम ढूंढे से ना पाते हैं ।
जब दूर तलक सन्नाटों में
वीरानी सी छा जाती है ।
तब और नहीं कुछ याद रहे
बस याद तुम्हारी आती है ।। 3 ।।
गर्म अंगीठी होती है
चूल्हे ठंडे रह जाते हैं ।
और रिश्ते नाते नहीं रहें
केवल पंगे रह जाते हैं ।
जब भीगी-भीगी सांझों वाली
रात सुहानी आती है ।
तब और नहीं कुछ याद रहे
बस याद तुम्हारी आती है ।। 4 ।।
कई तो ऐसे वर्ष यहां पर
सूखे खाली जाते हैं ।
हैं जाने कितनी राहें जिनपर
हम जाते ना आते हैं ।
जब कांटों की चुभन हमें
दोहरा-दोहरा सुलगाती है ।
तब और नहीं कुछ याद रहे
बस याद तुम्हारी आती है ।। 5 ।।
कुछ लोग तो ऐसे होते हैं
जाते हैं लौट ना आने को ।
छोड़ के जाते हैं यादें
बस जीवन भर तडपाने को ।
जब हृदयों की तड़प निकल कर
आंखों में आ जाती है ।
तब और नहीं कुछ याद रहे
बस याद तुम्हारी आती है ।। 6 ।।
कई बार कुछ लोग यहां
मिल जाते हैं वीराने में ।
कई बार सदियां लगती हैं
खुद को खो कर पाने में ।
जब खुद की यादें ही खुद को
पीड़ा ग्रह लेे जाती हैं ।
तब और नहीं कुछ याद रहे
बस याद तुम्हारी आती है ।। 7 ।।
रवि शंकर सिंह
' मंथन '