Thursday, May 30, 2019

ग़ज़ल

खुद में जिंदा खुद की खुद्दारी रखना ।।

मक्कारों के लिए ज़रा मक्कारी रखना ।।


मुश्किल का दौर है, मुश्किल से जाएगा,

मुश्किलों से थोड़ी रिश्तेदारी रखना ।।


फसे इस बार तो जाना, कितना मुश्किल है 

मुश्किल में तरकीबें बहुत सारी रखना ।।


वो चाहते हैं, निजाद-ए-इश्क, जाने दो उन्हें

दिल में उनकी यादें, प्यारी-प्यारी रखना ।।


दो चार फूल के लिए वो बना नहीं 'बेबस'

उसके लिए तो समूची फुलवारी रखना ।।



रवि शंकर सिंह

'मंथन'

Tuesday, May 28, 2019

ग़ज़ल

मोहब्बत से इनायत से वफ़ा से चोट खाई है ।।

खिलते गुलों ने जब भी हवा से चोट खाई है ।।

और अब हमको हकीमों की ज़रूरत क्या,

जब इन्हीं हकीमों की दवा से चोट खाई है ।।

तुम जब भी आना, तो दर्द ही बन के आना,

के नाज़-ओ-नखरे से, अदा से चोट खाई है ।।


रवि शंकर सिंह

'मंथन'

नई पोस्ट

हिचकियाँ

शाख पर जब धूल गई, तो पत्तियाँ अच्छी लगी।। रात में जलती हुई सब, बत्तीयाँ अच्छी लगी।। जब  अचानक  रुक  गई,  ये  नाम  लेने  से तेरा  तबसे मुझको ...

सर्वाधिक खोजी गई पोस्ट