मैंने अनवरत लड़े युद्ध
रवि शंकर सिंह ‘मंथन’
अम्बर में कुंतल जाल एक
मैंने देखा पाताल एक
फूलों की तुलसी माल एक
कैदी पंछी का हाल एक ।।
दोनों आँखों को मूँद मूँद
पीते थे पानी बूँद बूँद
राजा और रानी चले गए
सुनों एक कहानी बूँद बूँद
पानी के झरने का बहना
वो आसमान का एक गहना
मैं तुम्हें सुनाता शब्द शब्द
उसका था जो मुझसे कहना
मैंने अनवरत लड़े युद्ध
उसपर भी दुनियां रही क्रुद्ध
मैंने भी उनसे बात कहीं
न हो पाउँगा महा बुद्ध
बादल आसमान में काले हैं
हम भी थोड़े मतवाले हैं
बन पड़े जो तुमसे कर लेना
हम तलवार उठाने वाले हैं
थी मौत सामने खड़ी और
छाया होती थी बड़ी और
वह वक्त और था घड़ी और
अपनी तलवारें लड़ी और
फिर टूटी साँसे उखड़ गई
सब हवा हवा में बिखर गई
अब कोई जाने कैसे जाने
चिड़िया आसमान में किधर गई ।।।
रवि शंकर सिंह
मंथन
कविता को सुनने के लिए लिंक पर क्लिक करें :–https://youtu.be/Vpjnhxs2AnI







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