Friday, March 26, 2021
Tuesday, March 9, 2021
गुलाब की याद
गुलाब की याद
किताबों के पन्ने पलटते हुए
सरसराहट के बीच
मिला था एक सूखा गुलाब
यादें समेटे हुए
याद आ गया अचानक
केंटीन का वो दिन
कंधों पर रखा हुआ सर
आंखों से बहते हुए आंसू
और आंसू बहाती खूबसूरत सी आंखें
आखरी दिन था कॉलेज का
कालेज के बाहर तक का सफर
बड़ा लगा था बहुत बड़ा
मगर दरवाजे के बाहर
हम दोनो दो बसें हो गए
एक रास्ते पर चलते हुए
अलग मंजिल पहुंचने वाली
बसें
अब
फिर हम दोनों को बन जाना था
किताब में रखा हुआ गुलाब
और गुलाब की याद
रवि शंकर सिंह
' मंथन '
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