Friday, March 26, 2021

बिना पते की चिट्ठी

 बिना पते की चिट्ठी


मेरी किताब के पच्चीसवें पन्ने पर


लिखा था एक पता


जिसका पता मुझे नहीं था


जाने किसका था


शायद आत्मीय किसी का


कल पहुंच गया 


उसी पाते पर


जो लिखा था


मेरी किताब के पच्चीसवें पन्ने पर


दरवाजा खटखटाया तो निकली


एक छोटी सी बच्ची


अपनी माँ की उंगली पकड़े


माँं 


जिसे कभी देखा था मैंने


कॉलेज के चुनाव प्रचार में


पर अब नहीं था उसमें वो जुझारूपन


थीं झुर्रियां गालों पर


भंवर था मगर जिंदगी में


उसने नहीं देखा अब मुझे


छत की मुंडेर से


और मैं


लौट आया वापस


खुरदरी हथेली लिए


समय के शहर से


बिना पते की चिट्ठी सा



रवि शंकर सिंह
     ’मंथन’

Tuesday, March 9, 2021

गुलाब की याद


गुलाब की याद


किताबों के पन्ने पलटते हुए


सरसराहट के बीच


मिला था एक सूखा गुलाब


यादें समेटे हुए


याद आ गया अचानक


केंटीन का वो दिन


कंधों पर रखा हुआ सर


आंखों से बहते हुए आंसू


और आंसू बहाती खूबसूरत सी आंखें


आखरी दिन था कॉलेज का


कालेज के बाहर तक का सफर


बड़ा लगा था बहुत बड़ा


मगर दरवाजे के बाहर


हम दोनो दो बसें हो गए


एक रास्ते पर चलते हुए 


अलग मंजिल पहुंचने वाली 


बसें


अब


फिर हम दोनों को बन जाना था


किताब में रखा हुआ गुलाब


और गुलाब की याद 


रवि शंकर सिंह
    ' मंथन '



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