कुंडली
ताले को चाबी मिले, मिले हार को जीत
भले और कुछ ना मिले, मिले प्रीत को प्रीत ।।
मिले प्रीत को प्रीत, बात इतनी है दाता
जिसकी जेब भरी है, प्रीत वही कर पाता ।।
कहे मंथन कविराय, ज़ुबाँ पे आए छाले
बिन चाबी के जब भी, हमने खोले ताले ।।
दो घड़ी को ही तो आती है नींद बहलाने उस पर तेरा ख्याल जगा देता है हो गया है तुझसा ही ख़्याल तेरा भी न बैठे है मेरे पास दग़ा देता है ...