Sunday, September 29, 2019

कुंडली

                   कुंडली 


ताले को चाबी मिले, मिले हार को जीत
भले और कुछ ना मिले, मिले प्रीत को प्रीत ।।

मिले प्रीत को प्रीत, बात इतनी है दाता
जिसकी जेब भरी है, प्रीत वही कर पाता ।।

कहे मंथन कविराय, ज़ुबाँ पे आए छाले
बिन चाबी के जब भी, हमने खोले ताले ।।

रवि शंकर सिंह

     'मंथन'

Thursday, September 26, 2019

मरा हुआ आदमी

         मरा हुआ आदमी


आज फिर दिखा मुझे 

मरा हुआ आदमी,

चल रहा था सड़क पर

सभी से बेख़बर

कंधे पर बैग धरे

बैग नहीं ज़िम्मेदारियाँ

समाज की

घर की 

अपनों की

और साथ में एक लाश

सपनों की

जिसे वह कबका मार चुका है

मगर दफ़नाता नहीं है

न जलाता है

बस ढो रहा है

कांधे पर

जाने किस इंतज़ार में

खुद मर गया है

उसे ज़िंदा देखने के लिए

मगर 

मरे हुए सपने कब ज़िंदा होते हैं

मरे हुए सपनों ने

अब मार दिया है

आदमी को

मगर चल रहा है

मरा हुआ आदमी ।।


रवि शंकर सिंह

'मंथन'

Wednesday, September 25, 2019

ग़ज़ल

अन्धेरा हो और सूरज निकल आए ।।

कभी तो जिंदगी में ऐसा पल आए ।।


तुम्हारी जो चाल है,चाल तिरछी तिरछी,

देखना वो कोई दिल न कुचल आए ।।


कैसे तुम्हें देखें, दें आवाज़ पीछे से,

तुम हमसे कितना आगे निकल आए ।।


कुछ और हो तो भूल भी जाते मगर,

कैसे भूलें कि तुम पहले पहल आए ।।


शयद फिर से मिले वो साकी बेबस,

इक बार जो लौट वो महफ़िल आए ।।


रवि शंकर सिंह

    'मंथन'

Thursday, September 5, 2019

गुरु चरणों में निवेदित




गुरु बिन जीवन हो रहा, ज्यों गंगा बिन हरिद्वार 


आसमान तो साफ़ पर, चहू ओर अंधियार ।।


चहू ओर अंधियार, गुरु की महिमा न्यारी


गुरु की महिमा गाएँ, जगत के सब नर नारी ।।


कहे मंथन कविराय, गुरु के बिना न दिन गिन


आलौकित संसार भला कब होए गुरु बिन ।।



रवि शंकर सिंह


(  मंथन  )

Tuesday, September 3, 2019

तेरी आँखें


                 तेरी आँखें


तेरी आँखें सागर नहीं हैं,
खारे पानी का,
तेरी आंखें झील सी नहीं है,
गोता लगाने को,
तेरी आँखें मदप्याला नहीं हैं,
मदहोश करने को,
तेरी आँखें सूनी सड़क भी नहीं हैं,
रस्ता भूल जाने को,
तेरी आँखें कमल की पत्तियां नहीं हैं,
सूख जाने को,

तेरी आँखें एक ऐहसास हैं
पतझर में वसंत का
तेरी आँखें हैं जैसे
सूखी मिट्टी पे बारिश की बूंदें
तेरी आँखें हैं जैसे
पत्थरों में संगेमरमर
तेरी आँखें हैं तड़प का निदान
जैसे भूखे को रोटी
तेरी आँखे इबादत तिज़ारत खुदा की
बस तेरी आँखे तेरी आँखें,,,,,,,
तेरी आँखें


रवि शंकर सिंह
'मंथन'

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