कुंडली
ताले को चाबी मिले, मिले हार को जीत
भले और कुछ ना मिले, मिले प्रीत को प्रीत ।।
मिले प्रीत को प्रीत, बात इतनी है दाता
जिसकी जेब भरी है, प्रीत वही कर पाता ।।
कहे मंथन कविराय, ज़ुबाँ पे आए छाले
बिन चाबी के जब भी, हमने खोले ताले ।।
शाख पर जब धूल गई, तो पत्तियाँ अच्छी लगी।। रात में जलती हुई सब, बत्तीयाँ अच्छी लगी।। जब अचानक रुक गई, ये नाम लेने से तेरा तबसे मुझको ...