शाख पर जब धूल गई, तो पत्तियाँ अच्छी लगी।।
रात में जलती हुई सब, बत्तीयाँ अच्छी लगी।।
जब अचानक रुक गई, ये नाम लेने से तेरा
तबसे मुझको आ रही ये हिचकियाँ अच्छी लगी।।
रवि शंकर सिंह
दो घड़ी को ही तो आती है नींद बहलाने उस पर तेरा ख्याल जगा देता है हो गया है तुझसा ही ख़्याल तेरा भी न बैठे है मेरे पास दग़ा देता है ...