Tuesday, December 1, 2020
Wednesday, October 7, 2020
तुमसे भी खूबसूरत
तुमसे भी खूबसूरत
मैं नहीं कहूंगा तुम्हारी
आंखें सागर जैसी हैं
की तुम्हारे गेसू
काली घनी बदली जैसे हैं
मैं नहीं कहूंगा
तुम्हारे होंठ ,
गुलाब की पंखुड़ी से हैं
या
तुम्हारी गरदन सुराही जैसी
मैं नहीं कहूंगा तुम्हारी
आवाज कोयल सी है
और ये तो बिल्कुल नहीं कहूंगा
कि तुम्हारा जिस्म
संगमरमर सा तरासा गया है
क्योंकि तुम खूबसूरत हो
ऐसी उपमाओं से परे
किन्तु हां तुम खूबसूरत हो
किसी और से नहीं ,
तुम,
तुमसे से भी खूबसूरत ।।
रवि शंकर सिंह
' मंथन '
Monday, September 28, 2020
ग़ज़ल
ग़ज़ल
जब से हमारे हाथ में शराब नहीं है ।।
आंखों में कोई भी तो खाब नहीं है ।।
उसकी रोशनी से है गुलजार कोई और,
की मेरी छत पे मेरा ही मेहताब नहीं है ।।
वह जाते-जाते दे गया है मर्ज ला इलाज,
दुनिया में मर्ज इश्क सा कोई खराब नहीं है ।।
दिल में तमन्ना खलिश आंखों में लिए हैं,
मुझसा तो कोई और इज्तराब नहीं है ।।
खुद बदल के राह मुझको बेवफा कहा,
सनम तेरे सितम का भी जवाब नहीं है ।।
रवि शंकर सिंह
' मंथन '
इज्तराब ( बेचैनी )
Saturday, September 26, 2020
डूबा सूरज
डूबा सूरज
सूरज निकला था आज
पूरब से,
रोज ही निकलता है
पर आज कुछ तपिश कम थी
कम था ताप
चमक
उजाला
पर सूरज तो निकला था
यही गनीमत है
वरना एक रोज
डूब गया था
सूरज
भीतर ही भीतर
मेरे भीतर
रवि शंकर सिंह
' मंथन '
Thursday, September 10, 2020
मुक्तक
मुक्तक
आबाद अगर न हो पाओ, तो मेरी याद भुला देना ।।
याद बहुत तो आऊँगा, लेकिन हर बात भुला देना ।।
जो आगे बढ़ने से रोकें, और बने बेड़ियाँ पैरों की,
है तुम्हें इजाजत मेरी जाँ , ऐसे जज़्बात भुला देना ।।
रवि शंकर सिंह
' मंथन '
Monday, June 29, 2020
चीन की कुंडली
चीन की कुंडली
चीनी की तरहा नहीं, है चीनी सरकार ।।
बात बात पर चाहती, बेढंगी तकरार ।।
बेढंगी तकरार, और क्या कर सकती है ।।
हमको रही डराय, आप भी डर सकती है ।।
कहे मंथन कविराय, आ रही खुशबू भीनी ।।
सुगर फ्री अपनाओ, छोड़ दो बिलकुल चीनी ।।
सुनो की बिल्कुल दोगली, है चीनी सरकार
भाई भाई बोल कर, करे पीठ पर वार ।।
करे पीठ पर वार, है इनकी सोंच दोगली
ताकत रहे दिखाए, इनकी शाख खोखली ।।
कहे मंथन कविराय, हो जो ऐसा पड़ोसी
सीधे कर दो वार, न इनकी बात सुनो की ।।
माओ घाओ हो गया, नहीं बदलता चीन
सांपों के दो मुह मिलें, इनके मुह हैं तीन ।।
इनके मुह हैं तीन, भरोसा इनका कीजे
यानी इनके मुह में अपनी गरदन दीजे ।।
कहे मंथन कविराय, काटकर शीश चढ़ाओ
अगर सामने मिले, भटकता कोई माओ ।।
रवि शंकर सिंह
'मंथन'
Wednesday, June 17, 2020
हद कर दी
ग़ज़ल
तुमने हमको नहीं बुलाया हद कर दी ।।
बे-मतलब ही हमें थकाया हद कर दी ।।
महफ़िल एक सजाई अपने घर आँगन,
हमको सारी रात जगाया हद कर दी ।।
देख रहे थे खाब रखा सिर तेरे कंधे,
बे-मतलब ही हमें जगाया हद कर दी ।।
वेदों को बकवास पुराणों को मिथ्या,
और हमको हनुमान बताया, हद कर दी ।।
थे सारे घटिया शायर महफ़िल में तेरी,
सबको बढियाँ ठहराया, हद कर दी ।।
बिना आईना देखे तुमने काम किया,
हमको घटिया बतलाया, हद कर दी ।।
था जिन्हें समझ में न आता भूंगोल,
उनको तुमने इतिहास सुनाया हद कर दी ।।
अपने दिल की बात छुपा कर दिल में,
तुमने हमको खूब सताया हद कर दी ।।
हर सितम तुम्हारा सिर माथे पर लेते थे,
अपनी शादी में हमें बुलाया, हद कर दी ।।
रवि शंकर सिंह
'मंथन'
Monday, June 8, 2020
बेड़ियाँ ग़रीब की
बेड़ियाँ गरीब की
रोटियाँ गरीब की बेड़ियाँ बनी रही ।
भौं धनी समाज की उनपे ही तनी रही ।।
जरूरतें गरीब की बेइंतहां बढ़ती रही ।
बेबसी में यूँ ही उनकी जिंदगी सिमटी रही ।।
आबरू गरीब की बेआबरू होती रही ।
बेटियाँ गरीब की यूँ ही बिकती रही ।।
किस्मतें गरीब की यूँ ही बिगड़ती रही ।
मेहनतों से यू ही उनकी एड़ियाँ घिसती रही ।।
चंद नोट के लिए वो ठोकरें खाते रहे ।
अपनी जमीनों से वो यूँ ही भगाए जाते रहे ।।
खड़े कर दिए महल जिन्होंने आज वो गरीब है ।
पत्थर तोड़ के अपना वो बदल रहे नसीब हैं ।।
परेशानियां गरीब की उनकी उम्र बढ़ाती रही ।
कशमकस की मार में यू जिन्दगी बिखरी रही ।।
मदत् के नाम पर उन्हें खाक ही मिलती रही ।
सरकार अपने वादों से यू ही मुकरती रही ।।
रोटियाँ गरीब की बेड़ियाँ बनी रही ।
भौं धनी समाज की उनपे ही तनी रही ।।
हरी शंकर सिंह
'हरी'
Saturday, June 6, 2020
कलियों के राज कुँवर
कलियों के राज कुँवर
हे ! कलियों के राज कुँवर,
बधिक हुए क्यों पंखुड़ियों में ।
अमृत धारा बहती थी क्या,
या रस छुपा हुआ था पंखुड़ियों में ।
भूल गए थे उड़ना क्या तुम,
थे इतने खोए पंखुड़ियों में ।
उन्मुक्त गगन में उड़ने वाले,
क्यों बन्धन स्वीकार हुआ ।
या बात सिर्फ इतनी थी की,
पंखुड़ियों से प्यार हुआ ।
रहे बन्धे भोर तलक तुम
ऐसा क्या था पंखुड़ियों में ।
हे कलियों के राजकुँवर,
बधिक हुए क्यों पंखुड़ियों में ।।
रवि शंकर सिंह
'मंथन'
Sunday, May 24, 2020
ग़ज़ल मेरी
गुनगुनाओगे जब ग़ज़ल मेरी ।।
राज़ खोलेगी सब ग़ज़ल मेरी ।।
मुख़्तसर तुम तो मुझसे कहते नहीं,
मुख़्तसर होगी अब ग़ज़ल मेरी ।।
तुझपे ता-उम्र ग़ज़ल लिखूंगा,
बन गई है तलब ग़ज़ल मेरी ।।
उम्र गुज़री वफ़ा निभाने में,
दिल टोलेगी अब ग़ज़ल मेरी ।।
इश्क तमन्ना वफ़ा तिजारत भी
हो गई है सब ग़ज़ल मेरी ।।
तेरी भी आँखों से बहेंगे आँसू,
तुझसे बोलेगी जब ग़ज़ल मेरी ।।
हैं सभी देखते मुझको बेबस,
मेरा खुदा है रब ग़ज़ल मेरी ।।
रवि शंकर सिंह
''मंथन'
Tuesday, May 19, 2020
ग़ज़ल ।। देखो ।।
ये तुमसे देखते न बनेगा मगर देखो ।।
क्या से क्या कर दिया तुमने आयकर देखो ।।
मेरे खाबों की हकीकत को झूठ समझने वालों,
कैसे छाती है यहाँ रात जाग कर देखो ।।
रास्ते स्याह हैं काटों से भरे हैं लेकिन,
न हो यकीन किसी एक पे चल कर देखो ।।
कितने बेताब दिल हैं यहां फिरे सड़कों पर,
हाँ! मेरी जान जरा घर से निकल कर देखो ।।
तोड़ने वालों ने तोड़ा तो बहुत है लेकिन,
कैसे बनता है पुर्जा पुर्जा ये शहर देखो ।।
एक नया ताज बनाऊंगा मैं तेरे खातिर,
आता न हो यकीन तो मरकर देखो ।।
सबको मिटाने का रास्ता जो तुमने खोजा है,
लगेगा बरसने कुदरत का फिर कहर देखो ।।
रवि शंकर सिंह
'मंथन'
Monday, May 11, 2020
लॉक डाउन की मशुशाला
लॉक डाउन की मधुशाला
अपनी बोतल आप गटकते कौन यहाँ है दिलवाला ।।
हो कटु भावों की अंगूरी पर एक पिला दो तुम प्याला ।।
एक प्रश्न का उत्तर दीजे अधिक नहीं कुछ भी कीजे,
जब जेबें हल्की होती हैं क्यों घटती जाती है हाला ।।
अगर कहीं बेहोश मिलूँ या पाओ केवल शव राही,
और कहीं न ले जाना, पहुंचा देना बस मधुशाला ।।
है रिक्त जीवनी अपनी जैसे खाली पैकर हाथों में,
हूँ सिर्फ उसी के इंतज़ार में कब आएगी मधुबाला ।।
कोई एक पिए कोई दो, कोई ताबड़ तोड़ पिए,
अब हर प्याले में ढूंढ रहा मैं अपने सा पीने वाला ।।
रवि शंकर सिंह
'मंथन'
Thursday, April 23, 2020
कोरोना की कुंडली
कोरोना की कुंडली
बाबा हमरे कहत रहे वक्त बड़ा बलवान ।
फिरे जानवर मुक्त हैं पिंजरे में इंसान ।।
पिंजरे में इंसान समय की मार है ऐसी ।
बड़े बड़ों की कर दी इसने ऐसी तैसी ।।
कहे मंथन कविराय, बंद सब हैं मंदिर काबा ।
सबका करो प्रणाम सिखाईन हमारे बाबा।।
रवि शंकर सिंह
'मंथन'
Monday, April 20, 2020
कोरोना को राम राम
कोरोना को राम राम
हाथ जोड़ कर करो प्रणाम,
कहना केवल सीता राम ।। 0 ।।
नहीं लपक कर गले मिलाना
हाथ सम्भल कर सदा बढ़ाना ।
नहीं लगाया काहे मास्क
करते रहना सबसे आस्क ।
पैरों की भी कसो लगाम
कहना केवल सीता राम ।। 1 ।।
रिक्त न रखो नाक और कान
सबको रखना होगा ध्यान ।
छतीस इंची दूरी बनाओ
नहीं लपक कर हाथ मिलाओ ।
साबुन से भी लेना काम
कहना केवल सीता राम ।। 2 ।।
लगी बिपत की यहाँ झड़ी है
अभी मिलन की नहीं घड़ी है ।
नहीं मिलेंगे छत पर रात
सिर्फ़ फोन पर होगी बात ।
बस दूर दूर से लेना नाम
कहना केवल सीता राम ।। 3 ।।
मम्मी पापा भईया भाभी
सभी ढूंढना मिलकर चाबी ।
जिसने हमको इतना डराया
बंद घरों में किया, सताया ।
भूल न जाना उसका नाम
कहना केवल सीता राम ।। 4 ।।
गली मोहल्ले सूने सूने ,
निकल घरों से स्वेटर बूने
बंद घरों में बॉल और बल्ले
नहीं दिख रहे दोस्त निठल्ले ।।
करते हैं सब घर में काम
कहना केवल सीता राम ।। 5 ।।
रवि शंकर सिंह
'मंथन'
Thursday, April 9, 2020
ग़ज़ल
ग़ज़ल
ये तुमसे देखते न बनेगा मगर देखो ।।
क्या से क्या कर दिया तुमने आयकर देखो ।।
मेरे खाबों की हकीकत को झूठ समझने वालों,
कैसे छाती है यहाँ रात जाग कर देखो ।।
रास्ते स्याह हैं काटों से भरे हैं लेकिन,
न हो यकीन किसी एक पे चल कर देखो ।।
कितने बेताब दिल हैं यहां फिरे सड़कों पर,
हाँ! मेरी जान जरा घर से निकल कर देखो ।।
तोड़ने वालों ने तोड़ा तो बहुत है लेकिन,
कैसे बनता है पुर्जा पुर्जा ये शहर देखो ।।
एक नया ताज बनाऊंगा मैं तेरे खातिर,
आता न हो यकीन तो मरकर देखो ।।
सबको मिटाने का रास्ता जो तुमने खोजा है,
लगेगा बरसने कुदरत का फिर कहर देखो ।।
रवि शंकर सिंह
'मंथन'
Wednesday, March 18, 2020
स्याह रात की रोशनी
स्याह रात की रोशनी
हर तरफ़ रोशनी है
लाल नीली पीली
और सफ़ेद भी
रोशनी स्याह रात की
एकदम स्याह रात
मगर रोशनी तो है
सूरज ना हो
न सही
रात है अंधेरा है
और घरों में रोशनी
रवि शंकर सिंह
'मंथन'
Friday, March 6, 2020
चराग़
चराग़
बन के चराग़,
जिसके लिए,
वो,
जला रात भर,
होते ही भोर,
उसने वो,
दिया बुझा दिया ।।
रवि शंकर सिंह
'मंथन'
Saturday, February 15, 2020
ग़ज़ल
ग़ज़ल
तुमको तो बस आना था ।।
आ कर मुझे सताना था ।।
ये रोने वाले बोल रहे थे,
हमको भी मुस्काना था ।।
जहाँ खड़े हो पूंछ गए तुम,
अपना वही ठिकाना था ।।
हम रोज़ समय पर आते थे,
उनका तो रोज़ बहाना था ।।
हम जिसको साथी समझे थे,
वो तो कोई अनजाना था ।।
रवि शंकर सिंह
'मंथन'
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