कलियों के राज कुँवर
हे ! कलियों के राज कुँवर,
बधिक हुए क्यों पंखुड़ियों में ।
अमृत धारा बहती थी क्या,
या रस छुपा हुआ था पंखुड़ियों में ।
भूल गए थे उड़ना क्या तुम,
थे इतने खोए पंखुड़ियों में ।
उन्मुक्त गगन में उड़ने वाले,
क्यों बन्धन स्वीकार हुआ ।
या बात सिर्फ इतनी थी की,
पंखुड़ियों से प्यार हुआ ।
रहे बन्धे भोर तलक तुम
ऐसा क्या था पंखुड़ियों में ।
हे कलियों के राजकुँवर,
बधिक हुए क्यों पंखुड़ियों में ।।
रवि शंकर सिंह
'मंथन'
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