ग़ज़ल
जो गुज़रना है गुज़र जाए तो अच्छा है ।।
वो मुझको न नज़र आए तो अच्छा है ।।
वो जो कहते हैं आप, आप ही कि तरह हैं
इधर भी उनकी नज़र आए तो अच्छा है ।।
एक अरसे से नहीं दिखे बादल शहर में,
जो तेरी ज़ुल्फ़ बिखर जाए तो अच्छा है ।।
तेरी आरज़ू जीने का सलीका है अलग ,
ये सलीका हमें भी अगर आए तो अच्छा है ।।
हमें भी आ जाए इश्क मिजाजी का शऊर,
घाव कुछ और निखर आए तो अच्छा है ।।
रवि शंकर सिंह
'मंथन'