Sunday, November 24, 2019

अच्छा है

ग़ज़ल



जो गुज़रना है गुज़र जाए तो अच्छा है ।।
वो मुझको न नज़र आए तो अच्छा है ।।

वो जो कहते हैं आप, आप ही कि तरह हैं
इधर भी उनकी नज़र आए तो अच्छा है ।।

एक अरसे से नहीं दिखे बादल शहर में,
जो तेरी ज़ुल्फ़ बिखर जाए तो अच्छा है ।।

तेरी आरज़ू जीने का सलीका है अलग ,
ये सलीका हमें भी अगर आए तो अच्छा है ।।

हमें भी आ जाए इश्क मिजाजी का शऊर,
घाव कुछ और निखर आए तो अच्छा है ।।

रवि शंकर सिंह
'मंथन'

Tuesday, November 19, 2019

खंडहर में शहर

     खंडहर में शहर


इस खंडहर में एक शहर था

शहर में था एक मौहल्ला

मौहल्ले में एक गली थी

गली में एक टूटा मकान

जिसमें था एक पेड़

छायादार

घना और खूबसूरत

मैंने कहा पेंड था


पेंड पर बैठते थे दो कबूतर

जाने कब से 

मगर आज

न पेड़ है

न घर

न लोग

बस खंडहर है

वीरान, यादों से भरा


रवि शंकर सिंह

'मंथन'

Sunday, November 17, 2019

बूढा सज़र

बूढा सज़र

बूढा सज़र एक देख कर

फिर याद उसकी आ गई

छोड़ आया था जिसे

एक रोज़ मैं पीछे कहीं

रवि शंकर सिंह
'मंथन'

Friday, November 15, 2019

चार पंक्तियां

जाने कब क्या हो जाए, जलने और जलाने में ।।

क्या क्या छूट गया है पीछे, मिलने और मिलाने में ।।


आज मिले हो जब लिपटे हैं, अपने अंत जनाजे पर,

देर लगा दी तुमने कितनी, एक बार बस आने में ।।


रवि शंकर सिंह

     'मंथन'


#हिंदी कविता

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