Monday, June 29, 2020

चीन की कुंडली

चीन की कुंडली

चीनी की तरहा नहीं, है चीनी सरकार ।।
बात बात पर चाहती, बेढंगी तकरार ।।
बेढंगी तकरार, और क्या कर सकती है ।।
हमको रही डराय, आप भी डर सकती है ।।
कहे मंथन कविराय, आ रही खुशबू भीनी ।।
सुगर फ्री अपनाओ, छोड़ दो बिलकुल चीनी ।।


सुनो की बिल्कुल दोगली, है चीनी सरकार
भाई भाई बोल कर, करे पीठ पर वार ।।
करे पीठ पर वार, है इनकी सोंच दोगली
ताकत रहे दिखाए, इनकी शाख खोखली ।।
कहे मंथन कविराय, हो जो ऐसा पड़ोसी
सीधे कर दो वार, न इनकी बात सुनो की ।।


माओ घाओ हो गया, नहीं बदलता चीन 
सांपों के दो मुह मिलें, इनके मुह हैं तीन ।।
इनके मुह हैं तीन, भरोसा इनका कीजे
यानी इनके मुह में अपनी गरदन दीजे ।।
कहे मंथन कविराय, काटकर शीश चढ़ाओ
अगर सामने मिले, भटकता कोई माओ ।।


रवि शंकर सिंह
     'मंथन'

Wednesday, June 17, 2020

हद कर दी

ग़ज़ल

तुमने हमको नहीं बुलाया हद कर दी ।।
बे-मतलब ही हमें थकाया हद कर दी ।।

महफ़िल एक सजाई अपने घर आँगन,
हमको सारी रात जगाया हद कर दी ।।

देख रहे थे खाब रखा सिर तेरे कंधे,
बे-मतलब ही हमें जगाया हद कर दी ।।

वेदों को बकवास पुराणों को मिथ्या,
और हमको हनुमान बताया, हद कर दी ।।

थे सारे घटिया शायर महफ़िल में तेरी,
सबको बढियाँ ठहराया, हद कर दी ।।

बिना आईना देखे तुमने काम किया,
हमको घटिया बतलाया, हद कर दी ।।

था जिन्हें समझ में न आता भूंगोल,
उनको तुमने इतिहास सुनाया हद कर दी ।।

अपने दिल की बात छुपा कर दिल में,
तुमने हमको खूब सताया हद कर दी ।।

हर सितम तुम्हारा सिर माथे पर लेते थे,
अपनी शादी में हमें बुलाया, हद कर दी ।।

रवि शंकर सिंह
     'मंथन'

Monday, June 8, 2020

बेड़ियाँ ग़रीब की

बेड़ियाँ गरीब की

रोटियाँ गरीब की बेड़ियाँ बनी रही ।
भौं धनी समाज की उनपे ही तनी रही ।।

जरूरतें गरीब की बेइंतहां बढ़ती रही ।
बेबसी में यूँ ही उनकी जिंदगी सिमटी रही ।।

आबरू गरीब की बेआबरू होती रही ।
बेटियाँ गरीब की यूँ ही बिकती रही ।।

किस्मतें गरीब की यूँ ही बिगड़ती रही ।
मेहनतों से यू ही उनकी एड़ियाँ घिसती रही ।।

चंद नोट के लिए वो ठोकरें खाते रहे ।
अपनी जमीनों से वो यूँ ही भगाए जाते रहे ।।

खड़े कर दिए महल जिन्होंने आज वो गरीब है ।
पत्थर तोड़ के अपना वो बदल रहे नसीब हैं ।।

परेशानियां गरीब की उनकी उम्र बढ़ाती रही ।
कशमकस की मार में यू जिन्दगी बिखरी रही ।।

मदत् के नाम पर उन्हें खाक ही मिलती रही ।
सरकार अपने वादों से यू ही मुकरती रही ।।

रोटियाँ गरीब की बेड़ियाँ बनी रही ।
भौं धनी समाज की उनपे ही तनी रही ।।

हरी शंकर सिंह
      'हरी'


Saturday, June 6, 2020

कलियों के राज कुँवर

कलियों के राज कुँवर

हे ! कलियों के राज कुँवर,
बधिक हुए क्यों पंखुड़ियों में ।

अमृत धारा बहती थी क्या,
या रस छुपा हुआ था पंखुड़ियों में ।

भूल गए थे उड़ना क्या तुम,
थे इतने खोए पंखुड़ियों में ।

उन्मुक्त गगन में उड़ने वाले,
क्यों बन्धन स्वीकार हुआ ।

या बात सिर्फ इतनी थी की,
पंखुड़ियों से प्यार हुआ ।

रहे बन्धे भोर तलक तुम 
ऐसा क्या था पंखुड़ियों में ।

हे कलियों के राजकुँवर,
बधिक हुए क्यों पंखुड़ियों में ।।

रवि शंकर सिंह
'मंथन'


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