रोटियाँ गरीब की बेड़ियाँ बनी रही ।
भौं धनी समाज की उनपे ही तनी रही ।।
जरूरतें गरीब की बेइंतहां बढ़ती रही ।
बेबसी में यूँ ही उनकी जिंदगी सिमटी रही ।।
आबरू गरीब की बेआबरू होती रही ।
बेटियाँ गरीब की यूँ ही बिकती रही ।।
किस्मतें गरीब की यूँ ही बिगड़ती रही ।
मेहनतों से यू ही उनकी एड़ियाँ घिसती रही ।।
चंद नोट के लिए वो ठोकरें खाते रहे ।
अपनी जमीनों से वो यूँ ही भगाए जाते रहे ।।
खड़े कर दिए महल जिन्होंने आज वो गरीब है ।
पत्थर तोड़ के अपना वो बदल रहे नसीब हैं ।।
परेशानियां गरीब की उनकी उम्र बढ़ाती रही ।
कशमकस की मार में यू जिन्दगी बिखरी रही ।।
मदत् के नाम पर उन्हें खाक ही मिलती रही ।
सरकार अपने वादों से यू ही मुकरती रही ।।
रोटियाँ गरीब की बेड़ियाँ बनी रही ।
भौं धनी समाज की उनपे ही तनी रही ।।
हरी शंकर सिंह
'हरी'
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