Monday, June 8, 2020

बेड़ियाँ ग़रीब की

बेड़ियाँ गरीब की

रोटियाँ गरीब की बेड़ियाँ बनी रही ।
भौं धनी समाज की उनपे ही तनी रही ।।

जरूरतें गरीब की बेइंतहां बढ़ती रही ।
बेबसी में यूँ ही उनकी जिंदगी सिमटी रही ।।

आबरू गरीब की बेआबरू होती रही ।
बेटियाँ गरीब की यूँ ही बिकती रही ।।

किस्मतें गरीब की यूँ ही बिगड़ती रही ।
मेहनतों से यू ही उनकी एड़ियाँ घिसती रही ।।

चंद नोट के लिए वो ठोकरें खाते रहे ।
अपनी जमीनों से वो यूँ ही भगाए जाते रहे ।।

खड़े कर दिए महल जिन्होंने आज वो गरीब है ।
पत्थर तोड़ के अपना वो बदल रहे नसीब हैं ।।

परेशानियां गरीब की उनकी उम्र बढ़ाती रही ।
कशमकस की मार में यू जिन्दगी बिखरी रही ।।

मदत् के नाम पर उन्हें खाक ही मिलती रही ।
सरकार अपने वादों से यू ही मुकरती रही ।।

रोटियाँ गरीब की बेड़ियाँ बनी रही ।
भौं धनी समाज की उनपे ही तनी रही ।।

हरी शंकर सिंह
      'हरी'


No comments:

Post a Comment

नई पोस्ट

तेरा ख़्याल

दो घड़ी को ही तो आती है नींद बहलाने  उस पर तेरा ख्याल जगा देता है  हो गया है तुझसा ही ख़्याल तेरा भी  न बैठे है मेरे पास दग़ा देता है  ...

सर्वाधिक खोजी गई पोस्ट