बूढा सज़र
बूढा सज़र एक देख कर
फिर याद उसकी आ गई
छोड़ आया था जिसे
एक रोज़ मैं पीछे कहीं
रवि शंकर सिंह
'मंथन'
दो घड़ी को ही तो आती है नींद बहलाने उस पर तेरा ख्याल जगा देता है हो गया है तुझसा ही ख़्याल तेरा भी न बैठे है मेरे पास दग़ा देता है ...
No comments:
Post a Comment