बूढा सज़र
बूढा सज़र एक देख कर
फिर याद उसकी आ गई
छोड़ आया था जिसे
एक रोज़ मैं पीछे कहीं
रवि शंकर सिंह
'मंथन'
शाख पर जब धूल गई, तो पत्तियाँ अच्छी लगी।। रात में जलती हुई सब, बत्तीयाँ अच्छी लगी।। जब अचानक रुक गई, ये नाम लेने से तेरा तबसे मुझको ...
No comments:
Post a Comment