Thursday, April 9, 2020

ग़ज़ल

         ग़ज़ल


ये तुमसे देखते न बनेगा मगर देखो ।।

क्या से क्या कर दिया तुमने आयकर देखो ।।


मेरे खाबों की हकीकत को झूठ समझने वालों,

कैसे छाती है यहाँ रात जाग कर देखो ।।


रास्ते स्याह हैं काटों से भरे हैं लेकिन,

न हो यकीन किसी एक पे चल कर देखो ।।


कितने बेताब दिल हैं यहां फिरे सड़कों पर,

हाँ! मेरी जान जरा घर से निकल कर देखो ।।


तोड़ने वालों ने तोड़ा तो बहुत है लेकिन,

कैसे बनता है पुर्जा पुर्जा ये शहर देखो ।।


एक नया ताज बनाऊंगा मैं तेरे खातिर,

आता न हो यकीन तो मरकर देखो ।।


सबको मिटाने का रास्ता जो तुमने खोजा है,

लगेगा बरसने कुदरत का फिर कहर देखो ।।



रवि शंकर सिंह

'मंथन'

No comments:

Post a Comment

नई पोस्ट

हिचकियाँ

शाख पर जब धूल गई, तो पत्तियाँ अच्छी लगी।। रात में जलती हुई सब, बत्तीयाँ अच्छी लगी।। जब  अचानक  रुक  गई,  ये  नाम  लेने  से तेरा  तबसे मुझको ...

सर्वाधिक खोजी गई पोस्ट