Saturday, February 15, 2020

ग़ज़ल

       

    ग़ज़ल    


तुमको तो बस आना था ।।

आ कर मुझे सताना था ।।


ये रोने वाले बोल रहे थे,

हमको भी मुस्काना था ।।


जहाँ खड़े हो पूंछ गए तुम,

अपना वही ठिकाना था ।।


हम रोज़ समय पर आते थे,

उनका तो रोज़ बहाना था ।।


हम जिसको साथी समझे थे,

वो तो कोई अनजाना था ।।


रवि शंकर सिंह

'मंथन'

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