Thursday, September 26, 2019

मरा हुआ आदमी

         मरा हुआ आदमी


आज फिर दिखा मुझे 

मरा हुआ आदमी,

चल रहा था सड़क पर

सभी से बेख़बर

कंधे पर बैग धरे

बैग नहीं ज़िम्मेदारियाँ

समाज की

घर की 

अपनों की

और साथ में एक लाश

सपनों की

जिसे वह कबका मार चुका है

मगर दफ़नाता नहीं है

न जलाता है

बस ढो रहा है

कांधे पर

जाने किस इंतज़ार में

खुद मर गया है

उसे ज़िंदा देखने के लिए

मगर 

मरे हुए सपने कब ज़िंदा होते हैं

मरे हुए सपनों ने

अब मार दिया है

आदमी को

मगर चल रहा है

मरा हुआ आदमी ।।


रवि शंकर सिंह

'मंथन'

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