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हिचकियाँ
शाख पर जब धूल गई, तो पत्तियाँ अच्छी लगी।। रात में जलती हुई सब, बत्तीयाँ अच्छी लगी।। जब अचानक रुक गई, ये नाम लेने से तेरा तबसे मुझको ...
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मैंने अनवरत लड़े युद्ध रवि शंकर सिंह ‘मंथन’ अम्बर में कुंतल जाल एक मैंने देखा पात...
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मुक्तक सब समझता हूं तुम्हारी ये इशारेबाजियां ।। जानलेवा हो रही हैं अब कमर की चाबियां ।। जन्मभर के हैं जो सुधरे लाल मां के हैं सभी, माँ के प्...
Bahut badhiya
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