Wednesday, June 5, 2019

घनाक्षरी

घनाक्षरी


पतरी कमरिया पे, देखो बल खाए-खाए,
नैना बलखात खात, देखो चली जात है ।।

नैन देखो चन्द्रिका से, केस बदरी से लगे,
उर की उफ़ान देखो, आग भरी जात है ।।

चारु चन्द्र चन्द्रिका सी, चँचल चकोरी लगे,
चार दिन चाँदनी सी, आई चली जात है ।।

दिल में समात तात, देई जाए मात हाथ,
ताऊ उर बसी वा तो, उर बसी जात है ।।

रवि शंकर सिंह

'मंथन'

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