ग़ज़ल
तुम कोमल कंचन काया हो सकती थी ।।
तुम निर्झरणी मधुमाया हो सकती थी ।।
चयन तुम्हारा काँटे आग कांकरिया बस,
तुम रंग रंगीली सुंदर बगिया हो सकती थी ।।
क्यों तुमने चुनी है अग्नि वही दुपहर वाली,
तुम चन्द्र किरण सी शीतल छाया हो सकती थी ।।
रवि शंकर सिंह
'मंथन'
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