Monday, June 17, 2019

छोटी ग़ज़ल

ग़ज़ल

तुम कोमल कंचन काया हो सकती थी ।।
तुम निर्झरणी मधुमाया हो सकती थी ।।

चयन तुम्हारा काँटे आग कांकरिया बस,
तुम रंग रंगीली सुंदर बगिया हो सकती थी ।।

क्यों तुमने चुनी है अग्नि वही दुपहर वाली,
तुम चन्द्र किरण सी शीतल छाया हो सकती थी ।।

रवि शंकर सिंह
'मंथन'

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