Tuesday, March 9, 2021

गुलाब की याद


गुलाब की याद


किताबों के पन्ने पलटते हुए


सरसराहट के बीच


मिला था एक सूखा गुलाब


यादें समेटे हुए


याद आ गया अचानक


केंटीन का वो दिन


कंधों पर रखा हुआ सर


आंखों से बहते हुए आंसू


और आंसू बहाती खूबसूरत सी आंखें


आखरी दिन था कॉलेज का


कालेज के बाहर तक का सफर


बड़ा लगा था बहुत बड़ा


मगर दरवाजे के बाहर


हम दोनो दो बसें हो गए


एक रास्ते पर चलते हुए 


अलग मंजिल पहुंचने वाली 


बसें


अब


फिर हम दोनों को बन जाना था


किताब में रखा हुआ गुलाब


और गुलाब की याद 


रवि शंकर सिंह
    ' मंथन '



6 comments:

  1. Beautiful lines...Kavi Sahab

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  2. Waah waah.... college ke dino ki yaad

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  3. कविता अंत तक आते आते अत्यन्त मार्मिक हो जाती है।

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  4. बेहद शानदार

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  5. बहोत सुन्दर लिखा है आपने

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  6. Samjh me nhi aya but maja aya 😁

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