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तेरा ख़्याल
दो घड़ी को ही तो आती है नींद बहलाने उस पर तेरा ख्याल जगा देता है हो गया है तुझसा ही ख़्याल तेरा भी न बैठे है मेरे पास दग़ा देता है ...
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मैंने अनवरत लड़े युद्ध रवि शंकर सिंह ‘मंथन’ अम्बर में कुंतल जाल एक मैंने देखा पात...
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मुक्तक सब समझता हूं तुम्हारी ये इशारेबाजियां ।। जानलेवा हो रही हैं अब कमर की चाबियां ।। जन्मभर के हैं जो सुधरे लाल मां के हैं सभी, माँ के प्...
Beautiful lines...Kavi Sahab
ReplyDeleteWaah waah.... college ke dino ki yaad
ReplyDeleteकविता अंत तक आते आते अत्यन्त मार्मिक हो जाती है।
ReplyDeleteबेहद शानदार
ReplyDeleteबहोत सुन्दर लिखा है आपने
ReplyDeleteSamjh me nhi aya but maja aya 😁
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