मुक्तक
बात आधी अधूरी रही रात भर ।।
एक छत में ही दूरी रही रात भर ।।
थोड़े नाराज़ वो थोडे नाराज़ हम ,
थोड़ी थोड़ी गुरूरी रही रात भर ।।
रवि शंकर सिंह
दो घड़ी को ही तो आती है नींद बहलाने उस पर तेरा ख्याल जगा देता है हो गया है तुझसा ही ख़्याल तेरा भी न बैठे है मेरे पास दग़ा देता है ...
बेहतरीन
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