जाने कब क्या हो जाए, जलने और जलाने में ।।
क्या क्या छूट गया है पीछे, मिलने और मिलाने में ।।
आज मिले हो जब लिपटे हैं, अपने अंत जनाजे पर,
देर लगा दी तुमने कितनी, एक बार बस आने में ।।
रवि शंकर सिंह
'मंथन'
#हिंदी कविता
शाख पर जब धूल गई, तो पत्तियाँ अच्छी लगी।। रात में जलती हुई सब, बत्तीयाँ अच्छी लगी।। जब अचानक रुक गई, ये नाम लेने से तेरा तबसे मुझको ...
वाह, बेहतरीन
ReplyDelete👏👏
धन्यवाद गुरु
Deleteअदभुत, मज़ा आ गया।
ReplyDeleteधन्यवाद
Deleteबेटा।अभी से उदास कविता क्यों?
ReplyDeleteजीवन असभुत प्रसाद है।इसे पूरे उत्साह के साथ जीना सीखो।
कोई भी व्यक्ति जीवन में अंतिम नहीं जिसके लिए जीवन की सकारात्मक ऊर्जा से वंचित रहा जाये।
आपके ध्यानाकर्षण के लिए धन्यवाद मैंम और जहाँ तक बात है उदासी तो बेहतरीन लम्हां सा लगती है मैंम जिसमें कविताएं जल्दी बाहर आती हैं।
DeleteOssam bahai ji
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