Tuesday, November 19, 2019

खंडहर में शहर

     खंडहर में शहर


इस खंडहर में एक शहर था

शहर में था एक मौहल्ला

मौहल्ले में एक गली थी

गली में एक टूटा मकान

जिसमें था एक पेड़

छायादार

घना और खूबसूरत

मैंने कहा पेंड था


पेंड पर बैठते थे दो कबूतर

जाने कब से 

मगर आज

न पेड़ है

न घर

न लोग

बस खंडहर है

वीरान, यादों से भरा


रवि शंकर सिंह

'मंथन'

1 comment:

नई पोस्ट

तेरा ख़्याल

दो घड़ी को ही तो आती है नींद बहलाने  उस पर तेरा ख्याल जगा देता है  हो गया है तुझसा ही ख़्याल तेरा भी  न बैठे है मेरे पास दग़ा देता है  ...

सर्वाधिक खोजी गई पोस्ट