ग़ज़ल
जब से हमारे हाथ में शराब नहीं है ।।
आंखों में कोई भी तो खाब नहीं है ।।
उसकी रोशनी से है गुलजार कोई और,
की मेरी छत पे मेरा ही मेहताब नहीं है ।।
वह जाते-जाते दे गया है मर्ज ला इलाज,
दुनिया में मर्ज इश्क सा कोई खराब नहीं है ।।
दिल में तमन्ना खलिश आंखों में लिए हैं,
मुझसा तो कोई और इज्तराब नहीं है ।।
खुद बदल के राह मुझको बेवफा कहा,
सनम तेरे सितम का भी जवाब नहीं है ।।
रवि शंकर सिंह
' मंथन '
इज्तराब ( बेचैनी )
बढियां
ReplyDeleteधन्यवाद
Deleteबढियां
ReplyDeleteधन्यवाद
Deleteधन्यवाद
ReplyDeleteYe muskurahat mehez nakab hai..
ReplyDeletePurani hasi si ye lajawab nahi hai...
Kya baat kahi dil choor ho gyaaa...
Aapki gazlo ka bhi koi jawab nahi hai...
बहुत बहुत आभारी हूं सर इस तारीफ के लिए।
DeleteYe muskurahat mehez nakab hai..
ReplyDeletePurani hasi si ye lajawab nahi hai...
Kya baat kahi dil choor ho gyaaa...
Aapki gazlo ka bhi koi jawab nahi hai...