Monday, September 28, 2020

ग़ज़ल

 ग़ज़ल


जब से हमारे हाथ में शराब नहीं है ।।
आंखों में कोई भी तो खाब नहीं है ।।


उसकी रोशनी से है गुलजार कोई और,
की मेरी छत पे मेरा ही मेहताब नहीं है ।।


वह जाते-जाते दे गया है मर्ज ला इलाज,
दुनिया में मर्ज इश्क सा कोई खराब नहीं है ।।


दिल में तमन्ना खलिश आंखों में लिए हैं,
मुझसा तो कोई और इज्तराब नहीं है ।।


खुद बदल के राह मुझको बेवफा कहा,
सनम तेरे सितम का भी जवाब नहीं है ।।



रवि शंकर सिंह
    ' मंथन '

इज्तराब  ( बेचैनी )

8 comments:

  1. Ye muskurahat mehez nakab hai..
    Purani hasi si ye lajawab nahi hai...

    Kya baat kahi dil choor ho gyaaa...
    Aapki gazlo ka bhi koi jawab nahi hai...

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    Replies
    1. बहुत बहुत आभारी हूं सर इस तारीफ के लिए।

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  2. Ye muskurahat mehez nakab hai..
    Purani hasi si ye lajawab nahi hai...

    Kya baat kahi dil choor ho gyaaa...
    Aapki gazlo ka bhi koi jawab nahi hai...

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