तेरी आँखें
तेरी आँखें सागर नहीं हैं,
खारे पानी का,
तेरी आंखें झील सी नहीं है,
गोता लगाने को,
तेरी आँखें मदप्याला नहीं हैं,
मदहोश करने को,
तेरी आँखें सूनी सड़क भी नहीं हैं,
रस्ता भूल जाने को,
तेरी आँखें कमल की पत्तियां नहीं हैं,
सूख जाने को,
तेरी आँखें एक ऐहसास हैं
पतझर में वसंत का
तेरी आँखें हैं जैसे
सूखी मिट्टी पे बारिश की बूंदें
तेरी आँखें हैं जैसे
पत्थरों में संगेमरमर
तेरी आँखें हैं तड़प का निदान
जैसे भूखे को रोटी
तेरी आँखे इबादत तिज़ारत खुदा की
बस तेरी आँखे तेरी आँखें,,,,,,,
तेरी आँखें
रवि शंकर सिंह
'मंथन'
¿¿¿¿¿
ReplyDeleteसब उल्टा उल्टा हो गया।
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