Wednesday, September 25, 2019

ग़ज़ल

अन्धेरा हो और सूरज निकल आए ।।

कभी तो जिंदगी में ऐसा पल आए ।।


तुम्हारी जो चाल है,चाल तिरछी तिरछी,

देखना वो कोई दिल न कुचल आए ।।


कैसे तुम्हें देखें, दें आवाज़ पीछे से,

तुम हमसे कितना आगे निकल आए ।।


कुछ और हो तो भूल भी जाते मगर,

कैसे भूलें कि तुम पहले पहल आए ।।


शयद फिर से मिले वो साकी बेबस,

इक बार जो लौट वो महफ़िल आए ।।


रवि शंकर सिंह

    'मंथन'

4 comments:

  1. Replies
    1. कभी कभी कुछ और सिम्बल का भी इस्तेमाल कर लिया कर आंकित?

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  2. लाज़वाब शेर ❤️

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